बीरबल और माता महाकाली

बीरबल और माता महाकाली

एक दिन बीरबल को डराने के विचार से माता महाकाली ने अपना हजार मुख बाला विकराल रूप धारण कर रात्रि समय में उसको दर्शन दिए । बीरबल ने महामाया को देखकर हँसते हँसते उनको प्रणाम किया और फिर बिलकुल शांत हो गया । उसका यह हाल देखकर देवी विचारमग्न हो गयीं और उन्होंने मन में विचार किया-“पहले तो मेरे ऐसे भयानक रूप को देखकर इसे डर जाना चाहिए था, सो यह बिलकुल भी भयभीत न हुआ । दूसरे मुझे देखकर हंसा, तीसरे तुरंत ही ग़मगीन भी हो गया । इसीलिए इसकी इन मार्मिक बातों का भेद लेना चाहिए ।”

इसीलिए देवी प्रगट में बोलीं-“भक्तवर बीरबल ! तू मुझे देखकर पहले तो हंसा लेकिन फिर उदास क्यों हो गया ?” बीरबल ने बड़ी दीनताई से बोला-“मातेश्वरी ! आप अन्तर्यामिनीं हैं, आपसे किसी का कुछ भी छिपाव नहीं है । फिर भी आपके पूछने पर न बतलाना भी अनुचित है । मेरे हंसने का सबब यह है कि आपका दर्शन कर मैं बड़ा आनंदित हुआ, परन्तु दूसरा कारण मैं नहीं बताऊंगा । ”

जब देवी ने उसे धीरज देकर अभयदान देने का वचन दिया तो बीरबल बोला-” हे जगज्जनिनी जी ! मैं अपने मन में अनुमान कर रहा था कि मुझे केवल दो हाँथ, एक सिर और एक नाक है और आपको हजार सिर, हजार नाक और केवल दो ही हाँथ है । मैं जुखाम होने पर एक ही नाक को अपने दोनों हाथों से साफ करते करते थक जाता हूँ, फिर आपको जुखाम होगा तो आप हजार नाकों को केवल दो हाथों से ही कैसे साफ करेंगी । मुझे इसी चिंता ने शोकित कर दिया था ।”

देवी अपने भक्त बीरबल के उत्तर से संतुष्ट हुई और उसको आशीर्वाद देती हुई अंतर्ध्यान हो गयीं ।


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