मुल्ला की पगड़ी

मुल्ला की पगड़ी

अकबर बादशाह के दरबारियों में कई मुल्ले भी शरीक थे । उन्हीं में से एक मुल्ला जी का नाम दुआजा था । वह बीरबल के सामने तो मित्रता का व्यव्हार और हसीं मजाक करता था, परन्तु भीतर ही भीतर बीरबल को पछाड़कर अपनी प्रधानता चाहता था । एक दिन जब दरबार भरा हुआ था, बादशाह ने बीरबल की पगड़ी देखकर उसकी बड़ी तारीफ की ।

दुआजा बीरबल की प्रशंसा को सुनकर भीतर ही भीतर जल उठा, परन्तु अपना भीतरी भाव छुपाकर बादशाह से बोला-“यह कौन सी बड़ी बात है, मैं इससे भी अच्छी पगड़ी बांधकर दिखला सकता हूँ।” मुल्ला को दूसरे दिन पगड़ी बांधने की कला दिखलाने की आज्ञा देकर बादशाह ने दरबार बर्खास्त किया ।

मुल्ला मन में मस्त था, प्रभात होते ही पगड़ी बांधकर सभा में हाज़िर हुआ । बादशाह को मुल्ला के पगड़ी बांधने की कला पसंद आयी और लोगों के सामने उसकी बड़ी प्रशंसा की । यहाँ तक की उसकी पगड़ी को बीरबल की पगड़ी से अधिक विशेषता दी ।

तब बीरबल बोला-“जहाँपनाह ! यह इनकी करतूत नहीं है; इसका श्रेय इनकी स्त्री को मिलना चाहिए । उसी की मदद से मुल्ला साहब ने बाज़ी मार ली है । यदि मेरी बातों का यकीन न हो तो ये सबके सामने फिर से पगड़ी बांधकर दिखलावें ।”

मुल्ला जी की परीक्षा लेने के लिए उनकी पगड़ी उतार दी गयी, परन्तु वे ऐनक की सहायता के बिना फिर वैसी पगड़ी न बांध सके, अतएव बादशाह अकबर के सामने बेचारे मुल्ला जी को शर्मिंदा होना पड़ा। बादशाह ने बीरबल की सूक्ष्म दृष्टि की तारीफ की और मुल्ला जी की ओर हंस के बोला-“धन्य है मुल्ला साहब, जो कर्म आपसे नहीं बन पड़ता वो जोरू से करवाते है।”

मुल्ला जी ने शर्म से ने अपना सर पगड़ी में छुपा लिया और फिर कभी बीरबल से पंगा नहीं लिया ।


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