एक मूर्ख ब्राह्मण

The-foolish-sage-and-the-cheat

एक गांव के मंदिर में देवशर्मा नामक एक ब्राह्मण रहा करता था । गांव में हर व्यक्ति उसका सम्मान करता था और गांव के लोग उसे विभिन्न प्रकार के वस्त्र, आभूषण, और धन-धान्य दान में दिया करते थे । इस प्रकार ब्राह्मण के पास बहुत सारा पैसा जमा हो गया था । ब्राह्मण में बस एक ही कमी थी की वह किसी पर विश्वास नहीं करता था और अपनी धन की पोटली हमेशा अपनी कांख में दबाये घूमता रहता था । उसी गांव में एक ठग रहता था, उसकी ब्राह्मण के धन पर काफी दिनों से नजर थी, उसने काफी बार ब्राह्मण को लूटने का प्रयास किया था, लेकिन वह सफल न हो पाया था ।

कुछ दिनों के बाद उस ठग ने एक छात्र का रूप धारण किया और उस ब्राह्मण के पास गया । ठग ने ब्राह्मण ने कहा कि आप महँ संत है और मैं आपके सानिध्य में रहकर अपनी शिक्षा ग्रहण करना चाहता हूँ, कृपया मुझे अपना शिष्य बनाने की कृपा करें। ब्राह्मण ने पहले आनाकानी की, पर ठग के बार बार मनाने पर वह प्रसन्न हो गया और उसने ठग को गुरुदीक्षा दे दी । इस प्रकार ठग और ब्राह्मण दोनों मंदिर में साथ साथ रहने लगे । ठग मंदिर को साफ-सुथरा रखने लग गया और वह ब्राह्मण के सभी छोटे मोटे काम कर दिया करता था, इसलिए वह जल्द ही ब्राह्मण का विश्वास-पात्र बन गया।

एक दिन उस ब्राह्मण को पास के गांव से एक अनुष्ठान में भाग लेने के लिए बुलावा आया । ब्राह्मण ने निमंत्रण स्वीकार कर लिया और तय दिन पर वह उस गांव की और अपने ठग शिष्य के साथ चल दिया। रास्ते में एक नदी पड़ी तो ब्राह्मण ने सोचा कि अनुष्ठान में नहाकर जाना सही रहेगा, अतः वह अपनी धन की पोटली शिष्य को सौपकर नहाने के लिए नदी में उतर गया। ठग तो इस मौके किए काफी समय से प्रतीक्षा कर रहा था, अतः वह बिना समय गंवाए, धन की पोटली लेकर वहाँ से रफूचक्कर हो गया ।

जब ब्राह्मण नदी से बाहर आया तो धन की पोटली और शिष्य दोनों को वहाँ न देखकर दुखी हुआ और हाथ मलता रह गया ।

कहानी का सार :

कहानी का सार यह है कि ऐसे अजनबियों पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए जो मेमने के खाल में भेड़िये होते हैं।

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